Sunday, March 24, 2024

गांव के बिना महानगर का अस्तित्व अक्षुण्ण रह सकता है

गांव  के बिना महानगर का अस्तित्व अक्षुण्ण रह सकता है
खेत किसानी, बंपर फसल, फसल का बह जाना, अतिवृष्टि, अल्प वृष्टि, सूखा, जंगली जानवरों द्वारा फसल को नष्ट करना , दिन रात मेहनत और हाथ खाली, ऋण माफी, कभी कुर्की, आत्महत्या, कुछ नही हुआ तो पलायन ...
ये सब किसान और किसानी के साथ रहते है।
मानव सभ्यता का सबसे पुराना काम किसान के साथ जुड़े है, जानवर ,मवेशी, 
किसान की पहचान घर जाओ तो मट्ठा, दूध, खाने में घी ,साथ कुछ सब्जी और छोटी सी गठरी बांधने को आतुर...
दुनियां में सभी धंधे मंदे पड़ते है, लेकिन किसान की चर्चा अधिक होती है, काम नही करता, खाली बैठे ताश आदि खेलता है, फ्री राशन की खूब चर्चा है, कुछ वर्ष पूर्व जियो ने फ्री कूपन दिया था तो महानगर में लाइन लग गई थी, लेकिन उनकी चर्चा नही होती, किसानों और किसानी को हमेशा ही रहना होगा क्योंकि मैगी, पास्ता, समेत सभी खाने के प्रोडक्ट आते है, खेत से यहां तक नूडल, मोमो भी खेत से ही आते है, अनाज का रूप बदल कर...
आज भी तमाम बदलाव के बाद खेत खूबसूरत लगते है, लहलहाते है, फसल पकने पर आंखों में चमक आज भी आ ही जाती है...
शाम को आज भी सन्नाटा हो ही जाता है, दूध का धोहना आज भी जारी है...
दुरस्त खेतों पर्वतीय अंचलों में आज भी हल जारी है, ठीक वैसे जैसे सदियों से हो रहा है
आज भी शाम को मवेशी दिन छिपने से पहले घरों की ओर आते है.. शाम की पीली धूप में धूल उड़ती हुई दूर तक दिखाई पड़ती है..
आज भी कोई बुजुर्ग घर के आंगन में बैठा मिल जाता है, बीमार को देखने आज भी लोग आ हो जाते है, किसी के देहांत में आज भी लकड़ी का इंतजाम करते देखा जा सकता है,
बहुत कुछ बदल गया, लेकिन गांव की पुरातन परंपरा आज भी यदा कदा जारी है...
लोगों की गप्प शप्प आज भी जारी है....
कस्बा शहर में तब्दील हो रहे है, शहर महानगर और बड़े बड़े नगर और उपनगर में... ये सब खेती की जमीन को एक तरह से लील ही रहे है...
क्या गांव के बिना महानगर का अस्तित्व अक्षुण्ण रह सकेगा
ये गहन चिंतन का विषय है..
सोचना ही पड़ेगा, ये तय है....
रमेश मुमुक्षु
अध्यक्ष, हिमाल
9810610400
24.3.2024

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